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आतंक और हम

देश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा।
घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं, और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।
25 अगस्त को हैदराबाद के एक एम्यूजमेंट पार्क और फिर एक मशहूर चाट की दुकान पर कुछ ही मिनट के अंतर से एक के बाद एक हुए दो विस्फोटों में पचास से अधिक लोग मारे गए और 75 घायल हो गएराज्य व केंद्र सरकार ने इस हादसे के लिए भी, हर बार की तरह सरहद पार से आए आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि इन विस्फोटों के पीछे इस्लामाबाद का हाथ होने संबंधी भारत के आरोप को नकारते हुए पाकिस्तान ने कहा है कि यह आतंकवादियों का कृत्य है और हम इसकी निंदा करते हैं। हम खुद आतंकवाद के शिकार हैं और इसके खिलाफ लड़ने के लिए वचनबद्ध हैं। पाक के मुताबिक अटकलें लगाने की बजाय जांच करना हमेशा बेहतर होता है।
अपनी ही जमीन पर आतंकवाद के जिस दानव को उसने खड़ा किया था उसे पाकिस्तान काबू नहीं कर पा रहा है। इस तथाकथित जेहाद ने जिन्हें जन्म दिया है, वही लोग भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पाक ने हवा के बीज बोए थे, इसीलिए उसे बवंडर की फसल मिली है।
हमारा देश आतंकवाद की सर्वाधिक गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। सरकार के आतंकवाद विरोधी प्रयासों में तेजी और मजबूती लाने के लिए हमें आतंकवाद के आधार को निष्क्रिय करने वाले तथा आतंकी हमलों को शुरू होने से पहले ही रोकने वाले अधिक बुनियादी तरीके को अपनाने की तत्काल जरूरत है। मगर सबसे पहले सरकार को यह तय करना होगा कि आंध्रप्रदेश, असम और जम्मू-कश्मीर में उसका प्रस्ताव ठुकरा देने वाले आतंकियों को क्या वह बातचीत के लिए आमंत्रित करना चाहेगी। अगर सरकार सख्त रवैया अपनाए और आतंकियों के आगे घुटने न टेकने के संकेत दे, तो देश के नागरिक पूरी तरह से सरकार का साथ देंगे।
सरकार खुद कहती है कि देशभर में आईएसआई के एजेंट सक्रिय हैं। तो फिर इन्हें खोजने और इनकी घुसपैठ रोकने के लिए सरकार खुफिया एजेंसियों को निर्देश क्यों नहीं देती।
विदेश में प्रशिक्षित कोई आतंकी जब भारत या किसी महानगर में आता है, तो उसे रहने की जगह, अधिक से अधिक नुकसान के लिए हमला करने की जगह तक आने-जाने का साधन और संपर्क के लिए मोबाइल फोन के रूप में स्थानीय सहयोग की जरूरत होती है। निश्चित ही उसका कोई स्थानीय मेजबान होता है। खुफिया एजेंसियों को अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है, सिर्फ ऐसे सहयोगियों को खोजकर उन्हें पकड़ना है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे आतंकी संगठनों से मुल्क को किस तरह बचाया जाए जिन्हें किसी की जान लेने में कोई संकोच नहीं है और न ही अपने मकसद के लिए जान दे देने का ही कोई डर है। भारी- भरकम फौज का जमावड़ा, परमाणु संहार, अमेरिका की तरह ‘स्टार वार’ शैली और एंटी मिसाइल कवच जैसी रक्षा की पारंपरिक रणनीतियां तेजी से अनुपयोगी होती जा रही हैं और हमला कर भागने वाले आतंकियों को रोक पाने में अक्षम या कम सक्षम हैं। ‘पैटर्न्‍स ऑफ ग्लोबल टैरेरिज्म’ नामक वार्षिक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2000 और 2003 के बीच दुनियाभर में की गईं आतंकी घटनाओं में से 75 फीसदी भारत में हुईं। यह मानना सही होगा कि इनमें से कई हमले, खासतौर पर कश्मीर में हुए हमलों के लिए ऐसे संगठन जिम्मेदार हैं जिनका ठिकाना पाकिस्तान में है। और समर्थन हिंदुस्तान के ही नासूर मुस्लिमों द्वारा दिया जा रहा है ताकि वो घटना को अंजाम देकर आसानी से हिंदुस्तान में अपने शुभचिंतक मुस्लिम जेहादी के यहाँ आराम से शरण पाते हैं और अगर उसके घर की तलाशी ली जाये तो पुलिस के ऊपर मुस्लमान को तंग करने का इल्जाम लगाते हैं
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 203 अंतरराष्ट्रीय आतंकी हमले हुए जबकि चीन में एक भी नहीं। यह उस विचार से संबंधित कुछ वास्तविक समस्याएं हैं जिसके मुताबिक-लोकतंत्र सोचने व करने की ऐसी आदतें विकसित कर देगा जिनके चलते आतंकवाद से जुड़ने का इरादा कम हो जाएगा। मगर इनके अलावा तार्किक समस्याएं भी हैं। उदाहरण के लिए आतंकी आमतौर पर हाशिए के ऐसे समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें मुख्यधारा की आबादी से नहीं के बराबर सहयोग हासिल होता है। इस तथ्य की जानकारी के बावजूद वे मानते हैं कि उनकी राह सही है- शायद उन्हें विश्वास होता है कि उनके मकसद को ईश्वर ने अधिकृत कर रखा है।
भारत हमारा वतन है और इसकी रक्षा में योगदान देना हममें से हर एक का कर्तव्य है। किसी बस स्टॉप पर या आसपास, रेलवे स्टेशन या सबवे स्टेशन पर किसी संदिग्ध व्यक्ति या कुछ असामान्य दिखने पर कोई सूचना नहीं देता इसीलिए अधिकांश आतंकी बम विस्फोट होते हैं। अगर आप कुछ देखते हैं, तो कुछ कहिए, इस तरह की आसान प्रतिक्रिया खतरों को काफी कम कर सकती है। ऐसी सूचना देने की पहल करने वाले व्यक्ति को सरकार परेशान न करे। ऐसी सूचना किसी आतंकी घटना को होने से रोक सकती है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए प्रत्येक नागरिक को कानून लागू करवाने वाली एजेंसियों की आंख और कान की तरह काम करना होगा।

Comments

chandan said…
हम इस युद्ध मे तभी सफल हो पायेंगे, जब हम देशहित को वोट बैंक की राजनीति से उपर रखेंगे। हिन्दुस्तान में अब जरुरी को गया है कि संविधान में संसोधन हो और कानून एवं व्यवस्था का मुद्दा केन्द्र एवं राज्य दोनों की बराबर सहभागिता में रखा जाय। दोनों इसके लिये जिम्मेदार हों। हिन्दुस्तान में अमेरिका की "फेडरल ब्यूरो आँफ इनवेस्टीगेशन" की तर्ज पर केन्द्रीय बल गठित हो, जिसका केन्द्र बिन्दु सिर्फ आतंकवाद हो। हिन्दुस्तान की सुरक्षा के लिये गृहमन्त्रालय से अलग एक 'आन्तरिक सुरक्षा का मन्त्रालय' बनाया जाये जो सीर्फ आतंकवाद पर ही नजर रखें। केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बल भी दो धडों में विभाजित किये जायें। एक वह जो सीमा सुरक्षा की देखभाल करे और दूसरा वह, जो आतंकवाद की लडा़ई लड़े। इन दोनों धडो़ के हथियार और प्रशिक्षण भी अलग-अलग हों।
कुछ भी नहीं हो सकता । एक आतंकवादी को पकडो तो 100 नेता उसके लिये आंसू बहाने लगते है ।

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