Thursday, December 26, 2013

बिहार में हो रहे बलात्कार पर मीडिया क्यों चुप है ?

अनगिनत बलात्कार की घटनाओं का साक्षी रहा है सुशासन का बिगुल फ़ूँकता हुआ बिहार l बिहार में रोज तीन-चार बलात्कार की घटनाएँ (रिपोर्टेड) होती हैं l कुछ घटनाएँ सामने आती हैं तो ज्यादातर घटनाओं की ओर ना तो सरकार का ही ध्यान जाता है ना ही तथाकथित इलेक्ट्रॉनिक जागरूक मीडिया और जनमानस का l ज्यादातर घटनाएँ तो सतह पर अनेकों कारणों से आ ही नहीं पाती हैं और अनेकों घटनाओं पर पुलिस-प्रशासन पर्दा डालने का काम कर देता है l हासिल कुछ नहीं होता अपराधी जटिल कानूनी प्रकिया और जुगाड़-तंत्र के सहारे बेखौफ़ व बेलगाम हो कर नित्य नयी घटनाओं को अँजाम दे रहे हैं l
पिछले वर्ष दिल्ली की शर्मसार करने वाली घटना पर तो मुख्य-मंत्री श्री नीतिश कुमार जी का बयान तो आया था , बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के द्वारा संवेदनाएँ व्यक्त की गयीं थी, विरोध-प्रदर्शनों का दौर जारी था लेकिन अपने घर (प्रदेश) में घटित हो रही जघन्य-कुकर्मों के प्रति इन सबों की उदासीनता समझ से परे है ?
बिहार में पिछले कुछ सालों में बलात्कार , सामूहिक बलात्कार , बच्चों के साथ जबरन दुष्कर्म की घटनाओं में जबर्दस्त इजाफ़ा हुआ है जो बेहद ही चिंतनीय है l लेकिन ज्यादातर मामलों की ओर ना तो मीडिया का ध्यान जाता है ना समाज के स्वयंभु ठीकेदारों का l मीडिया भी महानगरों में घटित होने वाली घटनाओं को ही प्राथमिकता देती है , शायद महानगरों की घटनाएँ ज्यादा बिकाऊ होती होंगी ? समाचार पत्रों में किसी कोने में एक छोटी सी जगह दे कर या समाचार चैनलों के “ स्क्रॉल – बार ” पर डालकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लिया जाता है l हाल के दिनों में बलात्कार और यौन हिंसा के सबसे ज्यादा मामले बिहार से ही सामने आये हैं।
अनेकों घटनाएँ , जैसे परसा ,समस्तीपुर एवं दनियाँवा सामूहिक बलात्कार काँड , इस का ज्वलन्त उदाहरण हैं l अगर यही घटनाएँ किसी बड़े शहर में घटी होतीं तो कोहराम मच जाता , ब्रेकिंग – न्यूज का सब से बिकाऊ मसाला होता लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हमारा समाज और उसकी संस्थाएँ दोहरे मापदण्डों के साथ सीना तान कर चल रही हैं l नारी की अस्मिता के भी भिन्न-भिन्न मापदण्ड हैं शायद ? दनियाँवा और दिल्ली में फ़र्क तो है ही !!! लेकिन दोनों जगहों पर एक चीज जो कॉमन है वो है ” संवेदनहीन और संकीर्ण दृष्टिकोण ” वाली सरकार और कठपुतली की तरह चलने वाला शासन-तंत्र l दिल्ली की घटना के बाद किसी नेत्री ने कहा था कि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के विशेष प्रबंध होने चाहिए l लेकिन केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता ,सुरक्षा – प्रबंध सर्वत्र होने चाहिए l
चित्र में दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार में बलात्कार को लेकर स्थिति कितनी भयानक है और बिहार सरकार महिलाओं के प्रति बढ़ते हुए जघन्य अपराधों में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में गंभीर नहीं है। बिहार में हो रहे बलात्कार के मामलों और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर बिहार के मुख्यमंत्री की चुप्पी सच में हैरान करने वाली है l अनगिनत बलात्कार की घटनाओं का साक्षी रहा है सुशासन का बिगुल फ़ूँकता हुआ बिहार l बिहार में रोज तीन-चार बलात्कार की घटनाएँ (रिपोर्टेड) होती हैं l कुछ घटनाएँ सामने आती हैं तो ज्यादातर घटनाओं की ओर ना तो सरकार का ही ध्यान जाता है ना ही तथाकथित इलेक्ट्रॉनिक जागरूक मीडिया और जनमानस का l ज्यादातर घटनाएँ तो सतह पर अनेकों कारणों से आ ही नहीं पाती हैं और अनेकों घटनाओं पर पुलिस-प्रशासन पर्दा डालने का काम कर देता है l हासिल कुछ नहीं होता अपराधी जटिल कानूनी प्रकिया और जुगाड़-तंत्र के सहारे बेखौफ़ व बेलगाम हो कर नित्य नयी घटनाओं को अँजाम दे रहे हैं l
पिछले वर्ष दिल्ली की शर्मसार करने वाली घटना पर तो मुख्य-मंत्री श्री नीतिश कुमार जी का बयान तो आया था , बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के द्वारा संवेदनाएँ व्यक्त की गयीं थी, विरोध-प्रदर्शनों का दौर जारी था लेकिन अपने घर (प्रदेश) में घटित हो रही जघन्य-कुकर्मों के प्रति इन सबों की उदासीनता समझ से परे है ?
बिहार में पिछले कुछ सालों में बलात्कार , सामूहिक बलात्कार , बच्चों के साथ जबरन दुष्कर्म की घटनाओं में जबर्दस्त इजाफ़ा हुआ है जो बेहद ही चिंतनीय है l लेकिन ज्यादातर मामलों की ओर ना तो मीडिया का ध्यान जाता है ना समाज के स्वयंभु ठीकेदारों का l मीडिया भी महानगरों में घटित होने वाली घटनाओं को ही प्राथमिकता देती है , शायद महानगरों की घटनाएँ ज्यादा बिकाऊ होती होंगी ? समाचार पत्रों में किसी कोने में एक छोटी सी जगह दे कर या समाचार चैनलों के “ स्क्रॉल – बार ” पर डालकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लिया जाता है l हाल के दिनों में बलात्कार और यौन हिंसा के सबसे ज्यादा मामले बिहार से ही सामने आये हैं।
अनेकों घटनाएँ , जैसे परसा ,समस्तीपुर एवं दनियाँवा सामूहिक बलात्कार काँड , इस का ज्वलन्त उदाहरण हैं l अगर यही घटनाएँ किसी बड़े शहर में घटी होतीं तो कोहराम मच जाता , ब्रेकिंग – न्यूज का सब से बिकाऊ मसाला होता लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हमारा समाज और उसकी संस्थाएँ दोहरे मापदण्डों के साथ सीना तान कर चल रही हैं l नारी की अस्मिता के भी भिन्न-भिन्न मापदण्ड हैं शायद ? दनियाँवा और दिल्ली में फ़र्क तो है ही !!! लेकिन दोनों जगहों पर एक चीज जो कॉमन है वो है ” संवेदनहीन और संकीर्ण दृष्टिकोण ” वाली सरकार और कठपुतली की तरह चलने वाला शासन-तंत्र l दिल्ली की घटना के बाद किसी नेत्री ने कहा था कि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के विशेष प्रबंध होने चाहिए l लेकिन केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता ,सुरक्षा – प्रबंध सर्वत्र होने चाहिए l
चित्र में दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार में बलात्कार को लेकर स्थिति कितनी भयानक है और बिहार सरकार महिलाओं के प्रति बढ़ते हुए जघन्य अपराधों में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में गंभीर नहीं है। बिहार में हो रहे बलात्कार के मामलों और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर बिहार के मुख्यमंत्री की चुप्पी सच में हैरान करने वाली है l

Wednesday, June 30, 2010

हमला या साजिश












अमरनाथ दर्शन के लिए घाटी पहुचे जयपूर के श्रधालुओ पर मंगलवार को उपद्रवियों ने हमला किया हमला श्रीनगर से अनंतनाग के बीच दो बार वहां के लोगो द्वारा किया गया जिसमे दर्जन बसों के शीशे टूट गए और कई यात्री घायल हुए, जयपुर से १७५१ यात्री गए हुए थे जिन्हें अब रस्ते में रोका गया है जिससे उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पर रहा है, घायल यात्रियों अस्पताल में भर्ती करवाया गया है , यात्रियों ने समाचारपत्रों को फ़ोन पर बताया की उन्हें अभी तक कोई संतोषजनक जबाब नहीं मिला है , प्रशासन की तरफ से किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं की गयी है यात्रियों को आईजी, डीआईजी या अन्य अधिकारियो से मिलने नहीं दिया गया है।

अमरनाथ यात्रियों पर आज ये कोई पहला हमला नहीं है इससे पहले भी हमले होते रहे है

हमलो का एक संक्षिप्त व्योरा यहाँ दिया जा रहा है :-



  • वर्ष २००८ में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को आवंटित की जाने वाली भूमि के मसले पर जगह जगह हमले हुए थे जिसमे कई पर्यटक तथा यात्री घायल हुए थेऔर कई लोगो की मृत्यु हुयी थी ।


  • २५/०७/२००८ को अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों पर हथगोलों से हमला हुआ जिसमे ५ लोगो की मौत तथा कई लोग घायल हो गये थे ।


  • २१/०७/२००८ अमरनाथ तीर्थ यात्रियों पर ग्रेनेड से हमला जिसमे १० घायल, घायलों में अधिकांश साधू थे यह इस हपते में यात्रियों पर दूसरा हमला था।
    २२/७/२००७ अमरनाथ यात्रियों पर हथगोलों से हमला ८ साधुओ समेत १५ लोग जख्मी हो गये ।

  • ३०/७/२००२ अमरनाथ जा रहे तीर्थयात्रियो पर हमला किया गया जीमे दो की मृत्यु हो गयी तथा अन्य कई लोग घायल हो गये ।

  • 0६/०८/२००२ अमरनाथ यात्रियों और इसाई स्कुलो पर किये जा रहे हमलो की अमेरिका और ब्रिटेन ने निंदा किया ।


और भी कई हमले जो की हर साल अमरनाथ यात्रियों पर होते रहे हैं ।




इसके अलावा अमरनाथ यात्रियों और लंगर समितियों से जजिया टैक्स बसूला जा रहा है हर बस, ट्रक से २८००/- प्रतिदिन और हलके वाहनों से २३००/- प्रतिदिन के हिसाब से लिया जा रहा है । तथा हर लंगर समिति से २५०००/- रुपये लिया जा रहा है जबकि उनके लंगर लगाने वाले जगह को कम कर दिया गया है । इसके अलावा घाटी में घुसने पर अलग अलग स्थानों पर एंट्री फीस अलग से देना परता है ।




इधर भारत सरकार हजारो लाख रुपये हज यात्रियों को सब्सिडी देती रही है ।




आखिर यह सब क्या है ? क्यों बनाया जा रहा है हर वर्ष अमरनाथ यात्रियों को निशाना ? जबकि इसी हिन्दुस्थान में येही हिन्दू हज यात्रियों को अपने दिए गये टैक्स में से दी जा रही सब्सिडी के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाती बल्कि मुस्लिम हज यात्रियों का स्वागत करके विदा करती है । तो फिर क्यों नहीं कोई मुस्लमान अमरनाथ यात्रियों पर हमला करने वाले अपने मुस्लमान भाइयो को रोकता है ? कही से कोई आवाज़ नहीं उठती है आखिर क्यों ? क्या साम्प्रदायिक सद्भाव सिर्फ हिन्दुओ को ही चाहिए ?




मुस्लमान हिन्दू से हर कार्य को उल्टा करते हैं जैसे अगर हिन्दू दक्षिण को अपवित्र मानते हैं तो मुस्लिम उसे पवित्र मानते हैं। हिन्दू सीधे हाथ धोते हैं तो मुस्लिम उल्टा हाथ धोते हैं । हिन्दू गौ को अपनी माँ के सामान पूजते हैं तो मुस्लिम गौकशी करते हैं। हिन्दू अगर अपनी मातृभूमि की जय वन्देमातरम बोलते हैं तो मुस्लिमो को वन्देमातरम से परहेज है और वो इसके खिलाफ फतवा जरी करते हैं । हिन्दू तो मुहर्रम और ईद में सम्मिलित होते हैं लेकिन कोई मुस्लिम उनके त्यौहार नवरात्री या दीपावली में सम्मिलित नहीं होता बल्कि ऐसे त्योहारों ब्लास्ट कर देते हैं, हिन्दुओ (काफिरों) के खिलाफ जेहाद का आवाहन करते हैं इससे क्या साबित होता है ?

आखिर क्यों हम एकतरफा ताली बजाते रहे अगर भाईचारा चाहिए तो क्या इसके लिए हिर्फ़ हिन्दू ही हमेशा अपनी स्वाभिमान को ताक पर रख कर हाथ बढ़ाये क्या मुस्लिमो का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता ?

अमरनाथ यात्रियों पर हमले, हिन्दू मंदिरों में हमले, हिन्दुओ के तीज त्योहारों में हमले, गौकशी के द्वारा हिन्दुओ के अस्मिता पर हमला क्या यह साबित नहीं करता की हिन्दुओ के खिलाफ उनके अपने ही देश में उनके अपने ही तथाकथित भाइयो के द्वारा साजिश किया जा रहा है, यह साजिश नहीं तो और क्या है ?



वन्देमातरम








Saturday, April 10, 2010

पाकिस्तान में हिन्दू होना अभिशाप हो गया

खबर है कि पाकिस्तान के दक्षिण तटीय शहर कराची के एक निजी अस्पताल में काम करने वाली युवा नर्स बानो पिछले महीने से लापता है। नर्स के परिजनों ने घटना के पीछे धर्मातरण की आशंका जताई है। उनका आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद पुलिस ने नर्स का पता लगाने की जहमत नहीं उठाई। घटना से नाराज हिंदू माहेश्वरी समुदाय के दर्जनों लोगों ने कराची प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शन किया और उन्होंने केंद्रीय व प्रांतीय सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से बानो की सुरक्षित वापसी के लिए गुहार लगाई, लेकिन पाकिस्तान सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है। कराची प्रेस क्लब के सामने हाथों में नारे लिखी तख्तियां लिए प्रदर्शनकारी तीन सप्ताह से लापता बानो की तुरंत बरामदगी की मांग कर रहे थे। बानो एक निजी अस्पताल में काम करती थी। बानो की अस्पताल में मालिक के साथ अनबन थी। उन्होंने बताया कि हालांकि पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है लेकिन अब तक उसने कोई कार्रवाई नहीं की है।
पाकिस्तानी अखबार 'डेली टाइम्स' ने खबर दी है कि बानो तीन सप्ताह से लापता है। बानो के परिजनों को डर है कि हमें डर है कि कहीं उसकी हत्या न कर दी गई हो या जबरन धर्म परिवर्तन कराकर किसी मुस्लिम युवक से उसकी शादी न कर दी गई हो। सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय की महिलाओं और लड़कियों का अपहरण और बलात धर्मान्तरण करा कर जबरदस्ती विवाह कराना एक आम बात हो चुकी है और विगत कई सालों से ये कुत्सित खेल चल रहा है।
ऐसी ही कुछ घटनाएँ हैं जो ये सोचने पर मजबूर करती है कि जो भारतीय मीडिया पाकिस्तान की गुलामी में रात-दिन कसीदे पढ़ता रहता है उनके कानों में पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की चीखें क्यों नहीं पहुँचती। एक हिन्दू लड़की रबीना के साथ जो हुआ वह बात तो सामने आ गई मगर ऐसी घटनाएँ पाकिस्तान में रह रहे हर तीसरे हिन्दू परिवार केसाथ हो रही है। रबीना पाकिस्तान के सकूर में रहती थी और डॉक्टर बनना चाहती थी। इन्टरमीडिएट की परीक्षा में अच्छे अंक लेकर वह शहर के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए गई। उसका नाम और पिता का नाम बताते ही भर्ती करने वाले अधिकारी ने बताया कि उसे बिलोचिस्तान का डोमिसाइल सर्टिफिकेट (स्थानीय निवासी प्रमाण पत्र) लाना होगा। रबीना के पिता क्वेटा गए और कई दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद उनको कहा गया कि कि रबीना का परिवार अब सकूर में रह रहा है अत: वह सिंध से ही ये डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्राप्त करें।
रबीना ने काफी भागदौड़ की पर उसे निराशा ही हाथ लगी। अब उसने डॉक्टर बनने का सपना छोड़ दिया है, क्योंकि सभी मेडिकल कॉलेजों ने धर्म की आड़ में उसे एडमिशन देने से इंकार कर दिया है। आज वह घर में बैठी हुई है। कुछ दिन पहले धारकी कस्बे से एक हिन्दू विवाहित महिला का अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। बाद में उसे एक स्थानीय अदालत में पेश करवाकर उससे जबरन बयान दिलवाया गया कि उसने मुस्लिम लड़के से निकाह कर लिया है। बाद में उस इस हिन्दू महिला ने किसी तरह अपने माता-पिता से सम्पर्क करके बताया कि किस तरह उसका अपहरण कर स इसके बाद हिन्दू जाति का एक लडका अजीत इस संबंध में आगे आया। वह उच्चाधिकारियों के समक्ष यह रहस्य खोलता उसके पहले ही उसे बुरे परिणाम भोगने की धमकी दी गई। यह धमकी बारचुंडी के मुल्ला ने अजीत को दी कि वह इस मामले में चुप्पी साधे रखे। उधर, हिन्दू लड़की को भी धमकी दी गई यदि उसने पुन: हिन्दू परिवार में शामिल होने की कोशिश की तो उसके घरवालों को मार दिया जाएगा। बाद में अपहरण की गई उस महिला को गाँव में भीड़ में लेजाकर उससे कहलवाया गया कि इस्लाम धर्म उसने अपनी मर्जी से कुबूल किया है।

Saturday, September 6, 2008

कश्मीर में उठ रहे आज़ादी की मांग,


कश्मीर भारत में उठ रहे आज़ादी की मांग, या पाकिस्तान परस्त रास्त्र्द्रोही इस्लामिक जेहाद ?
कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट कहा जाता था आज भारत के लिए एक नासूर बन चूका है कारन सिर्फ मुस्लिम जेहाद के तहत कश्मीर को इस्लामिक राज्य बना कर पाकिस्तान के साथ मिलाने की योजना ही है, और आज रस्त्रद्रोही अल्गाव्बदियो ने अपनी आवाज इतनी बुलंद कर ली है की कश्मीर अब भारत के लिए कुछ दिनों का मेहमान ही साबित होने वाला है और यह सब सिर्फ कश्मीर में धारा ३७० लागु कर केंद्र की भूमिका को कमजोर करने और इसके साथ साथ केंद्र सरकार का मुस्लिम प्रेम वोट बैंक की राजनीती और सरकार की नपुंसकता को साबित करने के लिए काफी है यह बात कश्मीर के इतिहास से साबित हो जाता है जब सरदार बल्लव भाई के नेतृतव में भारतीय सेना ने कश्मीर को अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु नेहरु ने जनमत संग्रह का फालतू प्रस्ताव लाकर विजयी भारतीय सेना के कदम को रोक दिया जिसका नतीजा पाकिस्तान ने कबाइली और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और क़ाफ़ी हिस्सा हथिया लिया । और कश्मीर भारत के लिए एक सदा रहने वाली समस्या बन कर रह गयी और पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के लिए नित्य नयी चालें चलने लगा नतीजा भारत की आज़ादी के समय कश्मीर की वादी में लगभग 15 % हिन्दू थे और बाकी मुसल्मान । आतंकवाद शुरु होने के बाद आज कश्मीर में सिर्फ़ 4 % हिन्दू बाकी रह गये हैं, यानि कि वादी में 96 % मुस्लिम बहुमत है । वादी में कश्मीरी पंडितों की पाकिस्तान समर्थित इन्ही रस्त्रद्रोही अलगाव वादियों द्वारा खुले आम हत्याएं की जा रही थी और सरकार मौन रही थी इन हत्याओं और सरकार की नपुंसकता का एक उदाहरण यहाँ दे रहा हूँ सन् १९८९ से १९९० यानि एक वर्ष में ३१९ कश्मीरी पंडितों की हत्या की गयी और इसके बाद के वर्षो में यह एक सिलसिला ही बन गया था और सरकार का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब जम्मू-कश्मीर के वंधामा में दस साल पहले हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बारे में गृह मंत्रालय को जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने कहा है कि विभाग को ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है, जिसमें बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया था। यह घटना जग विदित है मगर सरकार को इसके बारे में मालूम नहीं, सरकार के इसी निक्कम्मा पण के वजह से आज इन रास्त्रद्रोही अलगाववादियों का हिम्मत इतना बढ़ गया है की अब ये कश्मीर को पूर्ण इस्लामिक राज्य मानकर कश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाने के लिए अब कश्मीर में बहरी राज्यों से आये हिन्दू मजदूरों को बहार निकल रहे हैं स्वतंत्रता दिवस के पवन अवसर पर हिंदुस्तान के रास्त्रघ्व्ज को जलाया गया हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाया जा रहा है और सरकार मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए चुप बैठी है कश्मीर में आर्मी के कैंप पर हमला करके उनको जलाया जा रहा है फिर हम कैसे कह सकते हैं की कश्मीर हमारे अन्दर में है अगर कश्मीर का मुस्लिम हमारे साथ है तो क्यों वह देशद्रोही अलगाववादियों का साथ दे रही है? अगर केंद्र सरकार कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो क्यों नहीं वह वहां के अलगाववादी आतंकवादियों को के खिलाफ एक्शन ले रही है ? क्यों नहीं सरकार विस्थापित कश्मीरी पंडितों को फिर से उनके जमीन को वापस दिला रही है क्यों कश्मीरी पंडितो के हक़ का दमन कर रही है ? क्यों नहीं आज तक हुए कश्मीर में कश्मीरी पंडितो के हत्याकांडो की जाँच करवा रही है ? कश्मीरी भाइयो का साथ देने वाले साम्प्रदायिक और अलगाववादी देशद्रोही सरकार के नज़र में क्यों आज़ादी का नेता बना हुआ है ? अगर इस सवाल का जवाब सरकार के पास नहीं है तो सरकार देश की जनता को धोखा देना छोर दे की कश्मीर हमारा है और अगर सरकार सच में कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो कश्मीरी पंडितो को इंसाफ दिलाये और अलगाववादी आतंकवादियों को सजा देकर कश्मीर को इन देशद्रोहियों से मुक्त कराये, अंत में एक सवाल सरकार और आपलोगों से क्या हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले अपने रास्त्रध्व्ज तिरंगे को सीने से लगाये मरने वाले साम्प्रदायिक हैं ?क्या हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगा कर अपने रास्त्र ध्वज तिरंगे को जलाने वाला देशद्रोही नहीं और अगर देश द्रोही है तो इसके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं ?
इस आंख की अंधी सरकार से इंसाफ की क्या उम्मीद
इसलिए अपने दर्द का मरहम ढूंढने आपके पास आये हैं हम

वन्देमातरम

Tuesday, April 29, 2008

अलगावबाद की आवाज

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद तथा संसद पर हमले के षड्यंत्र के दोषी एसआर गिलानी का भारत विरोधी रवैया क्या रेखांकित करता है? विडंबना यह है कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बावजूद तथाकथित सेकुलर खेमा ऐसी अलगाववादी मानसिकता का समर्थन करता है। क्यों? पिछले दिनों जम्मू के रियासी जिले के महोर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय और पाकिस्तानी मुद्राओं का चलन मान्य कर देने की सिफारिश की। इससे पूर्व पिछले साल जम्मू-कश्मीर सरकार के वित्तमंत्री तारीक हमीद कर्रा (पीडीपी नेता) ने प्रदेश के लिए अलग मुद्रा बनाने की बात उठाई थी। सईद का तर्क है कि जिस तरह यूरोपीय संघ के देशों में व्यापार आदि के लिए एक ही मुद्रा का चलन है उसी तरह घाटी में भी पाकिस्तानी मुद्रा का चलन हो ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार के साथ आपसी रिश्ते भी बढ़ें। मुफ्ती मोहम्मद सईद के कुतर्को को आगे बढ़ाते हुए पीडीपी के महासचिव निजामुद्दीन भट्ट ने कहा है कि कश्मीर के स्थाई निदान के लिए पीडीपी का जो स्व-शासन का फार्मूला है, दो मुद्राओं के चलन की बात उसी फार्मूले का आर्थिक पहलू है। यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए सईद यह भूल गए कि संघ के सभी सदस्य देशों में एक-दूसरे की मुद्रा आपसी रजामंदी से चलती है और यह व्यवस्था किसी एक राज्य या देश के लिए नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा का चलना जम्मू-कश्मीर पर भारत के दावे को कमजोर करेगा। मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं है। कुछ समय पूर्व उनकी पुत्री और पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को भारत आने की छूट देने की मांग की थी। स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद समय-समय पर घाटी से भारतीय फौज हटाने की मांग भी करते रहे हैं-अर्थात घाटी में आतंकवादियों का स्वागत और सेना का विरोध। कभी सेना हटाने तो कभी सीमाओं को खोल देने की वकालत करने वाले सईद पिछले साठ सालों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग क्यों नहीं करते? पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की बात क्यों नहीं उठाते? क्या पीडीपी कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती? क्या दो मुद्राओं के चलन की बात 'दो प्रधान, दो विधान, दो निशान' की अलगाववादी मानसिकता का अंग नहीं है?
यदि मुफ्ती मोहम्मद सईद अपने बयान को अलगाववादी मानसिकता का पोषक नहीं मानते तो उनकी भारतीयता संदिग्ध है। देश का एक बड़ा जनमानस मुफ्ती मोहम्मद सईद को कश्मीरी आतंकवाद का जन्मदाता मानता है। केंद्रीय गृहमंत्री रहते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री रूबिया का अपहरण और रिहाई के बदले बर्बर आतंकवादियों को छोड़ा जाना इस आशंका के पुख्ता आधार है। संसद पर हमले के आरोप में जब गिलानी को गिरफ्तार किया गया था तब सेकुलर बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग उनके समर्थन में आ खड़ा हुआ था। जांच एजेंसियों और न्यायपालिका पर कीचड़ उछाला गया और गिलानी की राष्ट्रभक्ति के कसीदे काढ़े गए, किंतु पिछले दिनों बरेली की एक संस्था 'पैगामे अमन' द्वारा आयोजित एक सेमिनार में गिलानी ने जो कहा उससे प्रत्येक राष्ट्रभक्त मुसलमान को भी पीड़ा हुई होगी और इसलिए आयोजकों को गिलानी के विचारों से अंतत: असहमति व्यक्त करनी पड़ी। गिलानी ने कहा था, ''मैं भारतीय नहीं हूं। न ही भारत से मेरा कोई ताल्लुक है। मैं कश्मीरी हूं और कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। कश्मीर में जो लोग लड़ रहे है वे आतंकवादी नहीं है। कश्मीर के लोगों की नजर में वे जननायक है।'' गिलानी ने आतंकवादियों की तुलना भगत सिंह से कर डाली। आगे उन्होंने भारत की न्याय व्यवस्था को कोसते हुए आरोप लगाया कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं होने के बावजूद न्यायपालिका केवल जनभावनाओं को ध्यान में रखकर उसे फांसी पर लटकाना चाहती है। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी मेहमान बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है। संसद पर हमला करने आए आतंकवादियों की कार में लगे गृह मंत्रालय के जाली स्टीकर पर यह वाक्यांश लिखा मिला थे-''भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।'' गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। ऐसे देश द्रोही बतौर अध्यापक नवयुवकों को नफरत और अलगाववाद के सिवा और क्या शिक्षा दे पाएंगे? जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन वाली सरकार है। विधानसभा चुनाव निकट आते देख पीडीपी का पाकिस्तान प्रेम और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देना आश्चर्यजनक नहीं है। अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयान की निंदा करने से कतराती कांग्रेस भी वस्तुत: चुनाव को देखते हुए अलगाववादी ताकतों को नाराज नहीं करना चाहती। आखिरकार धारा 370 कांग्रेस की ही तो देन है। पीडीपी का उद्देश्य वस्तुत: 'स्थायी निवासी विधेयक' जैसे कानूनों से धारा 370 की और अधिक किलेबंदी कर जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से हमेशा के लिए अलग कर देना है। जम्मू-कश्मीर की वृहत्त स्वायत्तता की मांग इसी दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। 'यदि कश्मीर की जनता भारत के साथ नहीं रहना चाहती है तो हम उन्हे उनकी इच्छा के विरुद्ध मजबूर नहीं करेगे,' मार्च 1948 के अपने भाषण में पंडित नेहरू ने श्रीनगर में जो बात कही थी उसका अक्षरक्ष: पालन यदि पीडीपी या कांग्रेस कर रही है तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है? 'माई फ्रोजन टरबुलेंस इन कश्मीर' नामक पुस्तक में लेखक जगमोहन ने लिखा है, ''द्वि-राष्ट्र सिद्धांत से जन्मा पाकिस्तान अपने संसाधनों पर जीवित है, किंतु यहां कश्मीर में धारा 370 और स्वायत्तता का मुद्दा इस तरह घालमेल कर बनाया गया है कि भारतीय धन से ही एक सल्तनत या छोटा पाकिस्तान पोषित किया जा रहा है।'' पं. नेहरू की अदूरदर्शिता से जन्मा कश्मीर संकट यदि आज नासूर बना है तो इसके लिए सेकुलर जमात ही प्रमुख कारण है, जो राष्ट्रीय हितों को भी वोट बैंक के पलड़े में तौलता है।

लिया गया : दैनिक जागरण संपादकीय २९/०४/२००८

Friday, March 7, 2008

आतंक और हम

देश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा।
घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं, और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।
25 अगस्त को हैदराबाद के एक एम्यूजमेंट पार्क और फिर एक मशहूर चाट की दुकान पर कुछ ही मिनट के अंतर से एक के बाद एक हुए दो विस्फोटों में पचास से अधिक लोग मारे गए और 75 घायल हो गएराज्य व केंद्र सरकार ने इस हादसे के लिए भी, हर बार की तरह सरहद पार से आए आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि इन विस्फोटों के पीछे इस्लामाबाद का हाथ होने संबंधी भारत के आरोप को नकारते हुए पाकिस्तान ने कहा है कि यह आतंकवादियों का कृत्य है और हम इसकी निंदा करते हैं। हम खुद आतंकवाद के शिकार हैं और इसके खिलाफ लड़ने के लिए वचनबद्ध हैं। पाक के मुताबिक अटकलें लगाने की बजाय जांच करना हमेशा बेहतर होता है।
अपनी ही जमीन पर आतंकवाद के जिस दानव को उसने खड़ा किया था उसे पाकिस्तान काबू नहीं कर पा रहा है। इस तथाकथित जेहाद ने जिन्हें जन्म दिया है, वही लोग भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पाक ने हवा के बीज बोए थे, इसीलिए उसे बवंडर की फसल मिली है।
हमारा देश आतंकवाद की सर्वाधिक गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। सरकार के आतंकवाद विरोधी प्रयासों में तेजी और मजबूती लाने के लिए हमें आतंकवाद के आधार को निष्क्रिय करने वाले तथा आतंकी हमलों को शुरू होने से पहले ही रोकने वाले अधिक बुनियादी तरीके को अपनाने की तत्काल जरूरत है। मगर सबसे पहले सरकार को यह तय करना होगा कि आंध्रप्रदेश, असम और जम्मू-कश्मीर में उसका प्रस्ताव ठुकरा देने वाले आतंकियों को क्या वह बातचीत के लिए आमंत्रित करना चाहेगी। अगर सरकार सख्त रवैया अपनाए और आतंकियों के आगे घुटने न टेकने के संकेत दे, तो देश के नागरिक पूरी तरह से सरकार का साथ देंगे।
सरकार खुद कहती है कि देशभर में आईएसआई के एजेंट सक्रिय हैं। तो फिर इन्हें खोजने और इनकी घुसपैठ रोकने के लिए सरकार खुफिया एजेंसियों को निर्देश क्यों नहीं देती।
विदेश में प्रशिक्षित कोई आतंकी जब भारत या किसी महानगर में आता है, तो उसे रहने की जगह, अधिक से अधिक नुकसान के लिए हमला करने की जगह तक आने-जाने का साधन और संपर्क के लिए मोबाइल फोन के रूप में स्थानीय सहयोग की जरूरत होती है। निश्चित ही उसका कोई स्थानीय मेजबान होता है। खुफिया एजेंसियों को अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है, सिर्फ ऐसे सहयोगियों को खोजकर उन्हें पकड़ना है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे आतंकी संगठनों से मुल्क को किस तरह बचाया जाए जिन्हें किसी की जान लेने में कोई संकोच नहीं है और न ही अपने मकसद के लिए जान दे देने का ही कोई डर है। भारी- भरकम फौज का जमावड़ा, परमाणु संहार, अमेरिका की तरह ‘स्टार वार’ शैली और एंटी मिसाइल कवच जैसी रक्षा की पारंपरिक रणनीतियां तेजी से अनुपयोगी होती जा रही हैं और हमला कर भागने वाले आतंकियों को रोक पाने में अक्षम या कम सक्षम हैं। ‘पैटर्न्‍स ऑफ ग्लोबल टैरेरिज्म’ नामक वार्षिक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2000 और 2003 के बीच दुनियाभर में की गईं आतंकी घटनाओं में से 75 फीसदी भारत में हुईं। यह मानना सही होगा कि इनमें से कई हमले, खासतौर पर कश्मीर में हुए हमलों के लिए ऐसे संगठन जिम्मेदार हैं जिनका ठिकाना पाकिस्तान में है। और समर्थन हिंदुस्तान के ही नासूर मुस्लिमों द्वारा दिया जा रहा है ताकि वो घटना को अंजाम देकर आसानी से हिंदुस्तान में अपने शुभचिंतक मुस्लिम जेहादी के यहाँ आराम से शरण पाते हैं और अगर उसके घर की तलाशी ली जाये तो पुलिस के ऊपर मुस्लमान को तंग करने का इल्जाम लगाते हैं
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 203 अंतरराष्ट्रीय आतंकी हमले हुए जबकि चीन में एक भी नहीं। यह उस विचार से संबंधित कुछ वास्तविक समस्याएं हैं जिसके मुताबिक-लोकतंत्र सोचने व करने की ऐसी आदतें विकसित कर देगा जिनके चलते आतंकवाद से जुड़ने का इरादा कम हो जाएगा। मगर इनके अलावा तार्किक समस्याएं भी हैं। उदाहरण के लिए आतंकी आमतौर पर हाशिए के ऐसे समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें मुख्यधारा की आबादी से नहीं के बराबर सहयोग हासिल होता है। इस तथ्य की जानकारी के बावजूद वे मानते हैं कि उनकी राह सही है- शायद उन्हें विश्वास होता है कि उनके मकसद को ईश्वर ने अधिकृत कर रखा है।
भारत हमारा वतन है और इसकी रक्षा में योगदान देना हममें से हर एक का कर्तव्य है। किसी बस स्टॉप पर या आसपास, रेलवे स्टेशन या सबवे स्टेशन पर किसी संदिग्ध व्यक्ति या कुछ असामान्य दिखने पर कोई सूचना नहीं देता इसीलिए अधिकांश आतंकी बम विस्फोट होते हैं। अगर आप कुछ देखते हैं, तो कुछ कहिए, इस तरह की आसान प्रतिक्रिया खतरों को काफी कम कर सकती है। ऐसी सूचना देने की पहल करने वाले व्यक्ति को सरकार परेशान न करे। ऐसी सूचना किसी आतंकी घटना को होने से रोक सकती है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए प्रत्येक नागरिक को कानून लागू करवाने वाली एजेंसियों की आंख और कान की तरह काम करना होगा।

दारुल उलूम का मुस्लिम सम्मेलन की सच्चाई

दारुल उलूम का मुस्लिम सम्मेलन खासी चर्चा में है। बेशक पहली दफा किसी बड़े मुस्लिम सम्मेलन में आतंकवाद की निंदा की गई, लेकिन आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद 'असंख्य निर्दोष मुस्लिमों पर हो रहे असहनीय अत्याचारों' पर गहरी चिंता भी जताई गई। आल इंडिया एंटी टेररिज्म कांफ्रेंस की दो पृष्ठीय उद्घोषणा में आतंकवाद विरोधी सरकारी कार्रवाइयों को भेदभाव मूलक कहा गया। इसके अनुसार निष्पक्षता, नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्यों वाले भारत में वर्तमान हालात बहुत खराब है। सम्मेलन ने आरोप लगाया कि इस वक्त सभी मुसलमान, खासतौर से मदरसा प्रोग्राम से जुड़े लोग दहशत में जी रहे है कि वे किसी भी वक्त गिरफ्तार हो सकते है। सम्मेलन में सरकारी अधिकारियों पर असंख्य निर्दोष मुस्लिमों को जेल में डालने, यातनाएं देने और मदरसों से जुड़े लोगों को शक की निगाह से देखने का आरोप भी जड़ा गया। सम्मेलन ने भारत की विदेश नीति और आंतरिक नीति पर पश्चिम की इस्लाम विरोधी ताकतों का प्रभाव बताया। देश दुनिया के मुसलमानों से हमेशा की तरह एकजुट रहने की अपील की गई। ऐलान हुआ कि सभी सूबों में भी ऐसे ही जलसे होंगे। सरकार के कथित मुस्लिम विरोधी नजरिए के संदर्भ में अवाम को बताया जाएगा।
सम्मेलन की उद्घोषणा दरअसल आतंकवाद से जारी संघर्ष की हवा निकालने वाली है। जाहिर है कि जलसे का मकसद दीगर था। आतंकवाद की निंदा की वजहें भी दूसरी थीं। निगाहे मुस्लिम एकजुटता पर थीं, निशाना आतंकवाद से लड़ रहा राष्ट्र था। इराक, अफगानिस्तान, फलस्तीन, बोस्निया और दक्षिण अमेरिकी देशों के मुस्लिम उत्पीड़न की चर्चा की गई। जेहाद के नाम पर मारे गए हजारों भारतीय निर्दोषों, श्रृद्धा केंद्रों, कचहरी और मेला बाजारों में मारे गए नागरिकों के बारे में शोक संवेदना का एक लफ्ज भी इस्तेमाल नहीं हुआ। आतंकवाद से लड़ते हुए मारे गए सैकड़ों पुलिस जवानों/ सैनिकों की तारीफ के बजाय पुलिस व्यवस्था को ही भेदभाव मूलक बता दिया गया। आतंकवाद के आरोपों में बंद 'असंख्य निर्दोष मुस्लिम' वाक्य का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्र-राज्य की घोर निंदा है। सम्मेलन की राय में यहां असंख्य मुसलमानों को बेवजह फंसाया जा रहा है। उन पर लगे सारे आरोप मनगढ़ंत है। सम्मेलन के मुताबिक देश के असंख्य मुसलमानों की जिंदगी तबाह है। वे प्रतिपल दहशत में हैं। उन्हे यहां सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं है। आतंकवाद विरोधी सरकारी कार्रवाई को मुस्लिम विरोधी बताने का काम अध्यक्षीय भाषण में भी हुआ। सम्मेलन के अध्यक्ष मुहम्मद मरगूबउर्रहान ने फरमाया, ''आतंकवादी कार्रवाई के सिलसिले में दोषी या कम से कम संदिग्ध करार देने के लिए न तो किसी विचार-विमर्श की आवश्यकता महसूस की जाती है, न किसी सावधानी से काम लिया जाता है और न तथ्य और प्रमाण इकट्ठा करने का कोई गंभीर प्रयास किया जाता है। उनको दोषी बताने के लिए केवल इतना ही आवश्यक समझा जाता है कि वे मुसलमान है।''
मौलाना ने आतंकवाद से निपटने में खास सतर्कता की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि इतिहास में अक्सर ऐसा हुआ है कि सरकार के दोषी हीरो कहलाए है-खासतौर से वे जिनके कट्टरवादी व्यवहार के कारण सरकार की ओर से अन्याय और अत्याचार हो। इतिहास के इस तथ्य पर नजर रखते हुए ऐसा काम न किया जाए जिसकी प्रतिक्रिया आतंकवाद के रूप में हो। यानी आतंकवाद के विरुद्ध नरमी से पेश आना चाहिए, अन्यथा इसकी प्रतिक्रिया में आतंकवाद और भड़केगा। केंद्र सरकार की नरम नीति उलेमा की हिदायत से मिलती-जुलती है। बावजूद इसके केंद्र पर असंख्य निर्दोष मुस्लिमों को जेल में बंद रखने के आरोप भी लगाए। दरअसल, मजहब और पंथ का उदय देश, काल और परिस्थिति में ही होता है। वे प्रत्येक देश, समय और परिस्थिति में उपयोगी नहीं होते। मजहब-पंथ का काम मानवीय सद्गुणों का विकास ही है। दर्शन और विज्ञान यही काम 'सत्य दिखाकर' करते है। पंथ और मजहब यही काम अकीदत और आस्था के जरिए करते हैं। मौलाना ने इस्लाम की तारीफ की। ठीक किया। यह भी कहा कि इस्लाम निष्पक्षता, न्याय और दया की सीख देता है। उन्होंने कुरान के हवाले से कहा कि इस्लाम में गवाही देते समय परिवार और संबंधी का मोह भी छोड़ने की हिदायत है। वह भूल गए कि कुरान की इसी आयत के बाद कहा गया है, ''जो ईमानवालों/मुसलमानों को छोड़कर इनकार करने वालों को अपना दोस्त बनाते हैं, क्या उन्हे प्रतिष्ठा की तलाश है।'' आगे हिदायत दी गई, ''ऐ ईमानवालो! इनकार करने वालों को अपना मित्र न बनाओ।'' यह भी कहा गया कि जो इस्लाम के अलावा कोई और दीन तलब करेगा उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न होगा और अंतत: वह घाटे में रहेगा।
सह-अस्तित्व और समझौते की बातें भी अध्यक्षीय भाषण में कही गईं, लेकिन कुरान में साफ हिदायत है, ''तुम अपने दीन के अनुयायियों के अलावा किसी पर भी विश्वास न करो।'' इस्लामी विचारधारा दुनिया के सभी मनुष्यों को दो हिस्सों में बांटती है। पहला, ईमानवाले यानी मुसलमान और दूसरे वे जिन्होंने इनकार किया। कुरान में बताया गया कि इनकार करने वालों से कह दो कि वे बाज आएं तो क्षमा है। यदि वे फिर भी वही करेगे तो जैसा पूर्ववर्ती लोगों के लिए किया गया, वही रीति अपनाई जाएगी। उनसे युद्ध करो, यहां तक कि फितना भी बाकी न रहे और दीन पूरा का पूरा अल्लाह के लिए हो जाए। सम्मेलन ने जिन फलस्तीन, इराक आदि का जिक्र किया है वहां इस्लाम के पहले क्या था? भारत नाजुक दौर में है। मौलाना ने बजा फरमाया कि आतंकवाद हमारे देश की मूल समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने गलत कहा कि यह साम्राज्यवादी देशों द्वारा फैलाया गया। प्राचीन अरब और अरबी सभ्यता पर पहला हमला इस्लामी विस्तारवाद ने ही किया। ऋग्वेद की निकटतम जेंदअवेस्ता वाली महान ईरानी सभ्यता भी इस्लामी हमले में तबाह हुई। यूरोप में स्पेन तक हमला हुआ। इस्लामी विस्तारवाद को भारत और स्पेन में ही टक्कर मिली, जबकि सीरिया, मिस्त्र, फलस्तीन और ईरान तबाह हो गए। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर तराई (1192 ई.) की लड़ाई तक वे यहां अपनी स्थायी हुकूमत नहीं बना पाए।
इस्लामी गलबे के खिलाफ पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, गुरु तेग बहादुर, शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह सहित हजारों लोग न लड़े होते तो भारत भी फलस्तीन, मिस्त्र, यूनान, ईरान और मध्य एशिया के तमाम इलाकों की तरह प्राचीन संस्कृति और इतिहास से शून्य होता?
मुस्लिम सम्मेलन ने विश्वव्यापी इस्लामी विस्तारवाद की चर्चा नहीं की। पाकिस्तान द्वारा मुसलसल भारत भेजे जा रहे आतंकवादी गिरोहों पर भी कोई बात नहीं हुई। पाक आतंकी डेली पैसेंजरी नहीं करते। वे भारत के ही लोगों द्वारा सहायता पाते हैं। सम्मेलन ने भारत के ऐसे राष्ट्रद्रोही तत्वों की आलोचना नहीं की। बावजूद इसके लोग खुश हैं कि सम्मेलन ने आतंकवाद के विरुद्ध बोलकर भारत पर भारी कृपा की है। विद्वान प्रधानमंत्री बुरे फंसे। वे मुस्लिम सर्वोपरिता और तुष्टीकरण का संगीत बजा रहे है। ये है कि तमाम नाजायज कोशिशों के बावजूद रुष्ट है, तुष्ट होने का नाम भी नहीं लेते और 'असंख्य निर्दोष मुस्लिमों' को जेल में यातना देने का आरोप भी लगा रहे है।