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एक और फतवा

अभी जब गणेश जी सहित देश के अनेक मन्दिरों में विभिन्न देवप्रतिमाओं ने दुग्ध पान किया तो सामान्य तौर पर हिन्दुओं ने इसे श्रद्धा के तौर पर नकारा भले न हो परन्तु धर्मगुरू और अन्य लोगों ने इसे अन्धविश्वास ही अधिक माना. इससे हिन्दू धर्म की तार्किकता प्रमाणित होती है. परन्तु इसी देश में ऐसे धर्म के अनुयायी भी रहते हैं जो न केवल धर्म पालन में वरन् दिन प्रतिदिन के नियम पालन में भी धार्मिक कानून से ही संचालित होते हैं. अभी वन्देमातरम् पर फतवे की गूँज कम भी नहीं हुई थी कि सहारनपुर स्थित सुन्नी मुसलमानों के सबसे बड़े संस्थान दारूल उलूम देवबन्द ने लखनऊ के सलीम चिश्ती के प्रश्न के उत्तर में फतवा जारी किया है कि बैंक से ब्याज लेना या जीवन बीमा कराना इस्लामी कानून या शरियत के विरूद्ध है. दारूल उलूम के दो मुफ्तियों के साथ परामर्श कर मोहम्मद जफीरूद्दीन ने यह फतवा जारी किया . आल इण्डिया पर्सनल लॉ बोर्ड के अनेक सदस्यों ने इसे उचित ठहराया है. उनके अनुसार जीवन बीमा कराने का अर्थ है अल्लाह की सर्वोच्चता को चुनौती देना. यह नवीनतम उदाहरण मुसलमानों की स्थिति पर फिर से विचार करने के लिये पर्याप्त है. आखिर जब इस आधुनिक विश्व में जब सभी धर्मावलम्बी लौकिक विषयों में देश के कानूनों का अनुपालन करते हैं तो फिर एक धर्म अब भी लौकिक सन्दर्भों में शरियत का आग्रह क्यों रखता है. हो सकता है बहुत से लोगों का तर्क हो कि कितने मुसलमान शरियत के आधार पर चलते हैं, परन्तु प्रश्न शरियत के पालन का उतना नहीं है जितना यह कि शरियत का पालन कराने की इच्छा अब भी मौलवियों और मुस्लिम धर्मगुरूओं में है. यही सबसे खतरनाक चीज है क्योंकि शब्द और विचार ही वे प्रेरणा देते हैं जिनसे व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने का जज्बा पालता है. मुस्लिम समस्या का मूल यहाँ है, जब तक उनकी इस मानसिकता में बदलाव नहीं आयेगा प्रत्येक युग में इस्लामी कट्टरता का खतरा बना रहेगा.

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